चाँद को चूने वाले इंसा देख तमासा लकड़ी का
जिस दिन तेरा जन्म हुआ था
मिला सहारा लकड़ी का
मिला पलंग तुझे लकड़ी का
सवा महीने की उमर हो गई तेरी ,
तुझे झुला झुलाया लकड़ी का
तीन साल की उमर हो गई तेरी ,
तेरे हाथ खिलौना लकड़ी का
पॉँचसाल की उमर को गई तेरी ,
तेरे पढने की तैयारी का ।
मास्टर जी ने तुझे डंडा दिखाया
दिया ज्ञान तुझे लकड़ी का॥
तेरी दस साल की उमर हो गई , खेलन की तैयारी का
चलो दोस्तों खेल खेले ये गुली-डंडा लकड़ी का
बीस साल की उमर हो गई तेरी शादी की तैयारी का
शादी करने जो बारात चली वो रेल का डब्बा लकड़ी का
दुल्हन केघर जो तोरण मारा वो तोरण था लकड़ी का
साठ बरस की उमर हो गई तेरी
घरवालो ने कहा लेले डंडा लकड़ी का
मिला सहारा लकड़ी का
और सौ साल की उमर हो गई तेरी जाने की तैयारी की
चार जानो ने तुझे उठाया मिला सहारा लकड़ी का
ऊपर लकड़ी नीचे लकड़ी तेरे
चारो कोने जलादी लकड़ी
मिला सहारा लकड़ी का
आधा धड़तेरा जल चुका था
मारा धोंसा लकड़ी का
मिला सहारा लकड़ी का
चाँद को चूने वाले इंसा देख तमासा लकड़ी का
चाँद को चूने वाले इंसा देख तमासा लकड़ी का...
अब तो कोई पेड़ नही कोटेगे फालतू में हां सहारा तो लकड़ी का लेना ही पड़ेगा
Saturday, January 17, 2009
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बहुत ही उम्दा रचना है।बहुत सुन्दर लिखी है।
ReplyDeleteबेहतरीन.
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